यदि मैं पत्थर हूँ तो अपने आप में एक शिल्प भी हूँ
जैसा मैं हूँ वैसा बनने में मुझे युग लगे हैं
हटाओ, अपनी सभ्यता की छैनी
हटाओ ये विकास के हथौड़े
मैं पत्थर हूँ, पत्थर की तरह मेरी क़द्र करो
ठोकर ज़रा सँभलकर मारना
पत्थर हूँ।
---------------
- कुमार अंबुज
---------------
 |
| कुमार अंबुज |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें