अख़बारी व्यंग्य से आप बोर भी हो सकते हैं किन्तु व्यंग्य यात्रा जैसी पत्रिका से आप व्यंग्य की क्लासिकी को परख सकते हैं । देश भर के (शायद प्रवासी देशों के भी) उन व्यंग्यकारों को जिन्हें ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए वे एक साथ इस पत्रिका में देखे जा सकते हैं । पत्रिका की महत्ता इस रूप में भी सिद्ध होती है कि व्यंग्य पर आप शोध करना चाहते हैं तो कुछ मत करिये - पिछले 11 वर्षों के 42 अंकों को संपादक जनमेजय जी से निवेदन कर माँग लीजिए, फिर देखिए आपकी एमफिल या पीएचड़ी या डी.लिट् कैसे फटाफट पूरी नहीं होती है । इस लिहाज़ से यह हिंदी में नये-पुराने सभी व्यंग्यकारों की सबसे ज़रूरी पत्रिका भी है । ठीक कहा गया है - सार्थक व्यंग्य की रचनात्मक पत्रिका।
अप्रैल-जून, 2015 का अंक एक तरह से व्यंग्य के आदिपुरुष हरिशंकर जी की नगरी जबलपुर के व्यंग्यकारों को फिर से याद दिलाने का अंक है । यह एक अच्छा प्रयोग है । इसी क्रम में आशा की जा सकती है कि व्यंग्य-गढ़ छत्तीसगढ़ पर भी कभी केंद्रित होगा संपादक का ध्यान । 'त्रिकोणीय' में ज्ञान चतुर्वेदी के चौंथे उपन्यास पर प्रभाकर श्रोत्रिय, दिलीप तेतरवे और विवेक मिश्र की सधी हुई गंभीर समीक्षा उपन्यास को बढ़े बिना भी मुझे उपन्यास के भीतर-बाहर से परिचित कराने जैसे लगी । अंक की लगभग सभी व्यंग्य रचनायें आज की विकराल परिस्थितियों पर चोट करती हैं ।
20 रुपये में इतनी अधिक सामग्री (120 पृष्ठ) कम लघुपत्रिकायें ही दे पा रही हैं, पर अकेले जूझते आदरणीय जनमेजय जी का हौसला बना रहे, इसलिए क्या सुधी पाठकों, हिंदी के हितैषियो को पहल पत्रिका की हितैषियों की तरह आगे आना नहीं चाहिए ? आप आगे आयें तो संपादक को बल मिलेगा । यह ठीक है कि 'मीडिया विमर्श' जैसे महत्वपूर्ण पत्रिका की ओर से 'पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रिकारिता सम्मान' से जनमेजय सर अंलकृत हो चुके हैं पर इससे आगे की भूमिका तो पाठक और समाज की भी है ।
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जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित त्रैमासिकी 'मीडिया विमर्श' की जब बात चली है तो क्यों न उसके नये अंक पर कुछ बात कर लें - यह अकं भारतीय मीडिया के भविष्य पर आकलन करता विशिष्ट अकं है यानी इंडियन मीडिया विज़न 2020 । प्रियदर्शन, पुष्पिता अवस्थी, जगदीश उपासने, गिरीश पंकज, जयदीप कार्णिक, तेजिन्दर की दृष्टि से असहमत होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि ऐसा न होगा 2020 में मीडिया का चेहरा । यूँ तो मीडिया विमर्श का हर अंक मीडिया कर्मियों के लिए एक आवश्यक पत्रिका की तरह होता है किन्तु यह अंक पत्रिकारिता को अध्यवसाय की तरह देखने वाले पाठकों के लिए संग्रहणीय भी बन पड़ा है ।
इस अंक में अष्टभुजा शुक्ल जैसे कवि का यात्रा संस्मरण भी चितरंजक है । संजय जी से आग्रह इतना ही कि आज की पत्रकारिता में भले ही साहित्य के लिए कोई स्पेस भले ही बचा नहीं, किन्तु आप अपनी बहु सम्मानित और बहु स्वीकृत पत्रिका में साहित्य के लिए कम से कम 10 प्रतिशत जगह ज़रूर दें जैसा आप शुरूआती अंकों में करते रहे हैं । यह भी इस पत्रिका के योग्य पाठकों यानी मीडिया शिक्षा के नवागत पीढ़ी के लिए भी शायद बेहद ज़रूरी हो । आपका संपादकीय तर्को और परिदृश्यों के साथ विचारणीय बन पड़ा है - सच है हिंदी के अखबारों में बौद्धिक विमर्श सिकुड़ता ही जा रहा है । पर इसे जैसा कि मैने पहले लिखा था - संपादक को पहले बचाइये और यह भी कि संपादक को सिर्फ़ संपादक ही बचा सकता है । यदि संपादक बच गया तो घरानों के लगभग गैर बौद्धिक यानी गोरखधंधी मालिक शायद बौद्धिक विमर्श के पन्नो को दीमक की तरह चाट नहीं सकेंगे ।
अंत में यही कि हमारे दोनों संपादक गुरु है अपने विषयों के तो उनके द्वारा संपादित पत्रिका भी शिष्यों के लिए पाठशाला की किताब की तरह तो होगी ही


